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  ग्रहों के प्रकार 






वरुण(Neptune)-



वरुण सौरमण्डल का चौथा बड़ा ग्रह है। जो आकार में चौथे नंबर पर है ।
  • इसके सतह का तापमान  लगभग  -193 डिग्री सेल्सियस तक होता  है। 
  • यहाँ पर मीथेन गैस की अधिक मात्रा होने जाने से यहाँ धुँधला  दिखाई देता है।
  • इसके  अभी तक आठ उपग्रह है उसमे से Triton एंड नेरीड एन  मुख्य  है।
  • इसके वायुमंडल में 98% He एवं He तत्व पाए जाते है।

सूर्य से दूरी के बढ़ते क्रम में ग्रह -

बुद्ध -शुक्र - पृथ्वी - मंगल - बृहस्पति - शनि - अरुण - वरुण 

आकार के  आधार पर बढ़ते क्रम में

बुद्ध - मंगल - शुक्र - पृथ्वी - वरुण  - अरुण - शनि- बृहस्पति 

Note- इनमे से केवल 5 ग्रहो को   बुद्ध, शुक्र, बृहस्पति, एवं मंगल को खुली आँखों से देखा जा सकता है। 




उपग्रह (Satellite)-

उपग्रह शब्द से ही अर्थ स्पस्ट हो रहा है कि जो ग्रहो का चक्कर लगाते है। उपग्रह के रूप में कोई पिंड हो सकता है ।वह पृथ्वी से छोड़ा गया कोई उपकरण भी हो सकता है । फ़िलहाल पृथ्वी का  उपग्रह चंद्रमा  है जिसपर जीवन का आशा किया जा रहा है। यह पृथ्वी का केवल एक मात्र ग्रह है। 

चंद्रमा(Moon)- 
चंद्रमा , पृथ्वी का चक्कर 27दिन 8 घंटे में पूरा करता है।  चंद्रमा अपनी धुरी एवम पृथ्वी का चक्कर समान समय मे लगता है इसलिए  पृथ्वी से 50% भाग ही चंद्रमा का देखा जा सकता है। 
पृथ्वी से दूरी - 3,82,200 किमी 
व्यास    -  3,475 किमी 
गुरुत्वाकर्षण बल g  -   पृथ्वी के छटे  भाग के बराबर अर्थात   Earth/6
चंद्रमा की सतह का अदृश्य भाग 40%  
 चंद्रमा की सतह में  सिलिकॉन, मैग्नीशियम एवं लोहा की प्रचुरता है।

क्षुद्रग्रह(Asteriods)- 

क्षुद्रग्रह का अर्थ है छोटा ग्रह ।  जिस पिंड की आकृति छोटी होने के साथ- साथ  वह जो सूर्य की परिक्रमा करते है क्षुद्र ग्रह कहलाता है। क्षुद्र ग्रह कभी - कभी  पृथ्वी  से टकराव होने के पश्चात वहाँ गर्त ( गहरा गढ्ढा)  का निर्माUण करते है और बरसात होने पर झील का निर्माण हो जाता है।  पहला खोजा गया क्षुद्र ग्रह सिरस है। 

धूमकेतु(comet)- 

धूमकेतु धूल एवं गैस के मिश्रण होते है जब यह सूर्य के नज़दीक जाते है तो इनका ठोस मध्य भाग जल जाता है और एक पूछ का निर्माण करता है जिसे पुच्छल तारा भी कहते है । इनमे चमक  पैदा होता है । 
धूमकेतु में हेली धूमकेतु प्रमुख है जो 76 वर्ष बाद दिखाई देता है। 
तथा एक शुमेकर लेवी- 9 भी देखा गया है।

उल्का(Meteor)- 

क्षुद्रग्रह एवं धूमकेतु के छोटे छोटे कण होते है जिन्हें उल्का पिंड कहलाते हैं। यह जब पृथ्वी के वायुमंडल में आते है तो घर्षण बल के कारण यह वायुमंडल में जलने लगते है । जो टूटते हुवे टारे की तरह प्रतीत होते है। 
यह पृथ्वी के वायुमंडल में पूरी तरह जल नही पाते जिन्हें उल्कापिंड(Meteorite) कहते है। 
 


Note- ब्रम्हांड में  किसी पिंड को मापने के लिए प्रकाशवर्ष से मापते है ।1 second में 3*10^8 मीटर के दूरी तय करती है।